LEKHA MANJARI For SANSKRIT LITERATURE
Call for Papers
Samprati Vārtāḥ (Śodhamañjarī)
An International Peer-Reviewed /Refereed Research Journal on Indian Knowledge System
🌐 Publishing in: Sanskrit | English | Hindi

Saturday, 28 October 2017

कृष्णस्य हासः                   कविता
                                                    रचयिता -  डा. गदाधर त्रिपाठी।    
अवतारेषु कृष्णो हि अद्भुत आह्लादकारकः।
यस्य हास्येन आबद्धा:सर्वा व्रजकन्यकाः।।
एकदा कुपिता माता कृष्णाय बन्धनं कृतम्।
अपूर्णा रज्जुरभवद्धि कृष्णेन हसितं तदा।।
निरावृता यदा अभवन् युवत्यो यमुनाजले।
चोरितानि वस्त्राणि  कृष्णेन हसितं तदा।।
विलपन्तं कृष्णं दृष्ट्वा विधेर्मनसि विभ्रमः।
कथं वै अयं भगवान् हि रुदन्नेवञ्च गच्छति  ।।
वत्साश्चोरितास्तेन प्रसन्नो$भवत् प्रजापति:।
इच्छया अपरा सृष्टिः कृष्णेन हसितं तदा।।
एकदा मघवा रुष्टः कृष्णात् कृपणचेतसा।
जलेन पूरिता पृथिवी चिन्तिता  व्रजवासिनः।।
गोवर्धनं समुत्थाप्य  प्रदर्शिता शक्तिर्यदा।
अवशोऽभवन्मघवा वै कृष्णेन हसितं तदा।।
नागविषेण यमुनायास्तदा वै जलमभवत् प्रदूषितम्।
यमुनाया निष्कासितो नागः कृष्णेन हसितं तदा।।
कंसस्य तु शक्तयः सर्वा विफला अभवन् यदा।
युद्धे हतो यदा कंसः कृष्णेन हसितं तदा।।
क्षणस्थितञ्च किमपि नास्ति प्रसन्नाश्च सर्वे वयम्।
अस्माकमज्ञतां पश्य कृष्णेन हसितं तदा।।
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